द्विवेदी युग की विशेषता- Dwivedi yug ki visheshta

भारतीय साहित्य का इतिहास विभिन्न युगों में विभाजित होता है, जो अपनी विशेषता और साहित्यिक योगदान के लिए प्रसिद्ध हैं। इन युगों में से एक युग है – “द्विवेदी युग,” जिसे साहित्यिक दरबार के राजा रामचन्द्र शुक्ल द्विवेदी के नाम पर रखा गया है। इस युग की विशेषताएं और उसके लेखकों के योगदान को समझना महत्वपूर्ण है।

लेख

द्विवेदी युग भारतीय साहित्य का एक उत्कृष्ट काल था, जिसकी विशेषताएं विवशता पैदा करती थीं। इस युग को द्विवेदी के नाम पर रखने का एक मुख्य कारण था – रामचन्द्र शुक्ल द्विवेदी के प्रसिद्ध कविता “हिंदी रामायण” के लिए जिन्होंने प्रशंसा की थी।

द्विवेदी युग के कवि और लेखक अपने समय के साहित्यिक दरबार के समर्थन में लेखन करते थे। उनके लेखन में राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं पर विचार किया जाता था, जो उनके लेखन को अद्भुत बनाते थे।

इस युग के प्रमुख साहित्यकारों में रामचन्द्र शुक्ल द्विवेदी, सुमित्रानंदन पंत, और जयशंकर प्रसाद शामिल थे। रामचन्द्र शुक्ल द्विवेदी के रचनाकारी अभियांत्रिकी और भक्ति रस की कविताएं उनके समय के बेहद प्रभावशाली थे। सुमित्रानंदन पंत ने प्रकृति और प्रेम के विषय में लगभग सभी रसों का उदाहरण दिया। जयशंकर प्रसाद के नाटक और गद्य काव्य में समाजवादी विचारधारा का प्रचुर्भाव देखा जा सकता है।

द्विवेदी युग में नारी लेखिकाएं भी अपने काल में महत्वपूर्ण योगदान करती थीं। इन लेखिकाओं ने समाज में नारी के स्थान के उत्थान के लिए अपनी रचनाएं लिखीं, जिनसे समाज की सोच बदलने में मदद मिली।

द्विवेदी युग के लेखक और कवि भारतीय संस्कृति और परंपरा के प्रति गहरा प्रेम रखते थे। इस युग में भारतीय भक्ति संस्कृति का प्रचुर्भाव देखा गया, जिसमें रामायण, महाभारत, उपनिषदों और पुराणों का उल्लेख था। इसके साथ ही, विभिन्न क्षेत्रों की रमणीयता और परंपराओं को व्यक्त करने में भी इनका योगदान था।

द्विवेदी युग के साहित्य में समाजवादी विचारधारा को बढ़ावा मिला। इस काल में समाज में बदलाव की जरूरत को महसूस किया जाता था और लेखकों ने इसे अपनी रचनाओं में दिखाने का प्रयास किया। उन्होंने समाज में गरीबी, असमानता और अन्य समस्याओं को उठाने के लिए अपनी लेखनी का इस्तेमाल किया।

द्विवेदी युग की कविता का शैली और रस अनूठा था। भक्ति रस की प्रधानता थी, जिसमें प्रेम, भक्ति, और श्रद्धा के भाव होते थे। इसके साथ ही, वीर रस और करुणा रस की भी विशेषता देखी जा सकती थी। ये रस उनकी कविताओं को रोमांचक बनाते थे और पाठकों को गहरे भावों में खिंच लेते थे।

द्विवेदी युग के नाटकों में विशेषता थी, जिसमें भाषा का सुंदरता और प्रभावशाली शब्दसंग्रह दिखाई देती थी। इन नाटकों में समाज के मुद्दे पर विचार किया जाता था और उनमें रंगबिरंगे पात्र दिखाए जाते थे।

इस अद्भुत साहित्यिक काल के अंत में, द्विवेदी युग के लेखकों ने अपने लेखन के माध्यम से भारतीय साहित्य को एक नया मुख्य धारा दिया। इनकी रचनाओं ने साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया और उनकी कृतियों को आज भी सम्मान और प्रशंसा मिलती है।

समाप्ति

द्विवेदी युग भारतीय साहित्य के एक सुनहरा पन्ना था, जिसमें कई महान कवि और लेखक ने अपनी रचनाएं लिखीं। इस युग में समाजवादी विचारधारा, भाषा की सुंदरता, और समृद्धि का भाव उभरता दिखाई दी। इन लेखकों के योगदान ने साहित्य को एक नया आयाम दिया और भारतीय साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया।

5 अद्भुत प्रश्न

  1. द्विवेदी युग कब था?
    • द्विवेदी युग 20वीं सदी के प्रारंभ में हुआ था और 21वीं सदी के आरंभ तक चला।
  2. इस युग के प्रमुख साहित्यकार कौन थे?
    • इस युग के प्रमुख साहित्यकार रामचन्द्र शुक्ल द्विवेदी, सुमित्रानंदन पंत, और जयशंकर प्रसाद थे।
  3. द्विवेदी युग में किस रस की प्रधानता थी?
    • द्विवेदी युग में भक्ति रस की प्रधानता थी, जिसमें प्रेम, भक्ति, और श्रद्धा के भाव होते थे।
  4. क्या द्विवेदी युग के लेखकों ने समाजवादी विचारधारा को प्रोत्साहित किया?
    • हां, द्विवेदी युग के लेखकों ने समाजवादी विचारधारा को प्रोत्साहित किया और इसे अपनी रचनाओं में दिखाया।
  5. द्विवेदी युग के कौन-कौन से नाटक विशेष हैं?
    • द्विवेदी युग के कुछ विशेष नाटक श्रीराम चरित मानस, धर्मवीर, और संत सुरदास शामिल हैं।

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